| دپایگی |
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بجای اخلاص ، ساده گی |
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بجای اخلاص ، یکرنگی |
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بجای استقلال ، خود پایگی |
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بجای امرار معاش ، بدست آوردن روزی |
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بجای امرار معاش ، بدست آوری روزی |
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بجای امرار معاش ، درپی روزی |
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بجای امرار معاش ، دریافت روزی |
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بجای برق قطع شد ، روشنائی رفت |
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بجای به درک واصل شد ، به دوزخ رفت |
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بجای تحصیل دانش ، درپی دانش |
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بجای تحصیل دانش ، فراگیری دانش |
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بجای تحصیل معاش ، بدنبال روزی و دارائی |
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بجای تحصیل معاش ، درپی روزی |
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بجای تحویل ، دریافت |
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بجای جراحت ، زخم |
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بجای خلاص ، رهائی |
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بجای خلاص کن ، رهاکن |
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بجای خلاص کن ،آسوده کن |
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بجای خلوص ، یکرنگی |
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بجای خودکفائی ، خود پایگی |
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بجای رجوع کنید ، بروید |
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بجای رجوع کنید ، رویکرد کنید |
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بجای زحمتکش ، پرتلاش |
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بجای زحمتکش ، کوشا |
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بجای صادق ، راستین |
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بجای صداقت ، درستی |
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بجای صفا ، یکرنگی |
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بجای طاهر ، بی آلایش |
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بجای فعال ، پرتلاش |
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بجای فعال ، کوشا |
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بجای فعالیت ، کارکرد |
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بجای کاسب ، بازاری |
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بجای کاسب ، روزیخور |
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بجای کسب ، روزی |
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بجای کسب و کار ، بدست آوردن روزی |
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بجای مجروح ، زخمی |
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بجای محصل ، دانش آموز |
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بجای مرجوعی ، برگشتی |
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بجای وصول شد ، دریافت شد |
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درود بر تو همیشه..
زبان همیشه زنده ی پارسی ،
آمیزه ای از شکر وهنر
ازآنچه که زبان ارزشمند پارسی رابرای همیشه
زنده و استوار و پابرجا ساخته است ، اوج آمیختگی
آن با دو پایه ی بنیادین شیرینی و زیباآفرینی اش ــ
که ازساختارخوب و بنیاد زیباشناسی اش
سرچشمه می گیرد ــ می باشد واینکه درنهادآن
آمیزه ی شکر ( شیرینی ) وهنر به اندازه ای به هم
وابسته که درهم اندوخته گردیده اند که جدایی
یکی ازآن دو همه ی ساختارش رادرهم
فرومی ریزد . دراین راستا تندروی و تعصب
نخواهد بود که گفته شود درسراسر جهان
هرگززبانی به این اندازه اززیبایی و برازندگی
برخوردارنبوده و اینچنین زبانهاودلهای مردم
دورونزدیک رابه سوی خود نکشانده است واین
است ازآنچه که این زبان همیشه پویارادرتاریخ
هرلحظه زنده تر ازپیش می نماید و اینگونه آن
رادرتاریخی هزاران ساله
همچنان تنومند تر ازسرو همیشه پابرجای تاریخ ،
استوار و توانمند نگه داشته و برای همه ی
روزگاران جاودانه کرده است .
چنین است که ساختارتنومند زبان پارسی را دو بن
مایه ی شکروهنر درهم آمیخته وازآن ساختارزیبای
بلند وتناوری ساخته که دیدنی ترین ساختارزیبای
تاریخ وجهان راازآن خود کرده است .
این دو آراسته ی زیبا و دیدنی از درون ونهاد هم
تراویده و به گونه ای زیبا درهم نهادینه
شده اند .چنانکه شیرینی (شکر) بودن آن همه ی
ساختار زیباآفرینی و زیبایی آن راــ که اوج نمود و
باروری ساختارهنرراپدید می آورد ــ به نمود آورده
و شاهکارهنری ارزشمند و جاودانه ای رابنیاد
ساخته که همیشه بناگاه همه ی دلها واندیشه ها
رابه تماشای خود می کشاند .
... واینکه می گویند : پارسی شکر است و تنها
بن مایه ی شکر بودن ( شیرینی ) آن
رادرنهادهمیشه زنده اش یاد می کنند ،به
دورازراستی است که
تنهابه این یک اندوخته در آن بسنده کرد که در
نهادش دوبن مایه ی ارزشمند وهمیشه زنده ی
شکر وهنر درتراوش است .
درود برتو
... به پیشگاه بلند
وآسمانی تو
پیشکش می کنم
... و به نام ویادتو
می آغازم ...
پارسی
همیشه زنده هست
هرگزنمی می رد
ایرانی
همیشه درتاریخ درخشیده
و زنده بوده است
... و اگر جز این بود ،با آن همه دست درازیها
و بدبختی هایی که ازدشمنان بیرون وبیشتر درون
به آن شده و می شود ، چنین راست
و استوار در تاریخ برجای نمی ماند
پارسی ،
زنده است .
درخشنده ترین
خورشیدی که
در تاریکترین ژرفای روزگار به جهان
تابیده است
وچنین است که
زبان ارزشمند
و گرانمایه ی پارسی
همچنان زنده ترازهمیشه نزدمردم دورونزدیک
جهان می تابد و زنده ترازپیش است



